खो गया था मैं , इन अनगिनत लोगों में
चमकते तारों को देखा
तालाब में बहती पानी को छूआ
बारिश में भीगा
तब जाके अपने आप से फिर मिल पाया
इस लम्हें को जी लिया
इस ज़िन्दगी को जी लिया
अब मरने से कौन डरे
जो मरके भी जीना सीख ले, वोह किससे डरे
कुदरत कहों या भगवान् कहों
चमकते तारे कहो या बरसते बूंद कहो
जो मन में आये सो कहो
मन भी तो कुदरत की देन है
खोया नहीं था
खोया नहीं था मैं , इन अनगिनत लोगों में है आज अपने आप को पाया
~ अविनाश पात्रा